Monday, February 20, 2017

उँगलियों के पोरुए (Fingertips) - हस्तरेखा




यदि दार्शनिक दृष्टि से देखा जाए तो हाथ में उगलियों को तब तब स्थान ही नहीं मिलता जब तक उनमें पोरुए नहीं होते। प्रत्येक उगठी पोरुओं हा के मिलने से बनती है। यदि पोरुए न हों तो उगली हाथ में हैं इसका ज्ञान ही नहीं होता। कार्य के सुभीते तथा आवश्यकता के अनुसार हरेक उगली में तीन पोरुए होते हैं जो कि अलग-अलग सतरज और तमादि गुणों के प्रतीक हैं। उगली के पोरुओं के क्रमानुसार ही इन तीनों का क्रमशः समावेश हो यह कोई आवश्यक बात नहीं है। फिर भी यहाँ इतना कह देना आवश्यक ही होगा कि किसी न किसी रूप में किसी न किसी पोरुए में किसी न किसी गुण का न्यूनाधिक भेद से अवश्य ही समावेश होता है। साधारणतया पोरुओं का आकार अथवा बनावट गुणानुसार तीन ही प्रकार की होती है।




(१) प्रथम चमसाकार (Spatulate)
(२) द्वितीय वर्गाकार (Square)
(३) तृतीय नौकोले (Pointed)

(१) चमसाकार-पोरुओं की बनावट एक विशेष प्रकार के कोण द्वारा इनकी आकृति को प्रदशित करती है। चमसाकार आकृति वाले पुरुष बड़े ही उद्यमी, कर्मठ, तुरन्त कार्य वाले उत्साही तथा लगन वाले होते है। ये लोग बड़े ही सभ्य, कायदे कानून को समझने वाले तथा उसका पालन करने वाले होते हैं। ये लोग उत्तम कोटि के खिलाड़ी तया देशाटन प्रिय होते है और साथ ही ऐतिहासिक अनुसन्धानकर्ता भी होते हैं। नियमित तथा अविरल कार्य के अभ्यासी होने के कारण सदैव किसी भी कार्य के परिणाम पर सफलता से पहुंचने वाले होते हैं। ये लोग प्रत्येक बात को तर्क दृष्टि से देखकर तथा उस पर पूर्ण रूप से विचार करके किसी भी कार्य को आरम्भ करते हैं। चमसाकार पोरूओं वाले व्यक्ति अच्छे वैज्ञानिक आविष्कर्ता तथा अच्छे लेखक भी होते हैं। नितिन कुमार पामिस्ट

(२) वर्गाकार-पोरुओं की बनावट वर्ग से मिलती है जिनकी लम्बाई चौड़ाई के समान ही होती है। ऐसे पोरुओं का प्रभाव विचारशकिन, कार्य-दाक्ति नियमित प्रबन्ध आज्ञा देने तथा आज्ञा पालन दोनों पर ही पड़ता है। इसलिये ये लोग शान्ति के साथ गम्भीर स्वर में बात करते हैं और चाहे जितना भी कार्य हो बिना शिकायत करते जाते हैं। इन्हें इनाम और प्रशंसा का लालच नहीं होता। पद लोलुपता इन्हें नहीं डिगा सकती फिर भी ये अपने परिश्रम को व्यर्थ होता हुआ नहीं देख सकते। ये बड़े ही शान्त, साफ तथा दयालु प्रकृति के होते हैं। आम तौर पर इनका स्वास्थ्य बड़ा ही सुन्दर होता है इसलिये प्रत्येक खेल में उत्साह से भाग लेते हैं किन्तु कुश्ती करना इन्हें विशेष रूप से -रुचिकर होता है। वर्गाकार पोरुए साधारणत: सभी प्रकार के अच्छे व्यवसायी, कलाकार, दस्तकार तथा अच्छे लेखकों के भी पाये जाते है।

(३) नोकोले-पोरुए अधिकतर लम्बे नाखून वाले पोरुए ही हो सकते हैं। इनकी बनावट नाखूनों की तरफ बहुत कुछ नोकदार गोलाई लिये हुए लम्बी प्रकार की होती है। जिन मनुष्यों के पोरुए पूर्ण रूप से एक विशेष प्रकार के न्यून कोण के समान नोकीले होते हैं वे अक्सर सौन्दर्य के उपामक, खुशामद पसन्द प्रेम के विवरण पढ़ने वाले, तथा बारीक उन्तकारी की प्रशंसा करने वाले होते हैं। जिन मनुष्यों के पोरुए विशेष रूप से मुन्दर नौकीले होते है वे लोग ख़ास तौर पर अपने भविष्य परिणाम को जानने वाले होते है। ये लोग कार्य की महानता तथा न्यूनता के अनुसार अपने को परिणित कर लेते हैं और अपन साथियों को चकित कर देते हैं। ये लोग बाहरी आडम्बरों से दूर रहकर हृदय की आवाज पर कार्य करने वाले होते हैं। कोमल करों में नोकीले पोरुए शुभ फल प्रद नहीं होते। ऐसे व्यक्ति काल्पनिक होते हैं और अदृश्य वस्तुओं के प्रभाव से भयभीत रहते हैं और परिश्रम से घबराते हैं। सदैव असम्भव कल्पित स्वप्नों को सत्य करने में लगे रहते हैं। कभी-कभी इच्छाओं की पूर्ति न होने पर प्राण तक दे देते हैं। नितिन कुमार पामिस्ट

तर्जनी
(१) यदि तर्जनी उगली का प्रथम पोरुआ नोकीला और दूसरे पोरुए से बड़ा हो तो वह अपने प्रभाव से उस मनुष्य को धर्म के विरुद्ध, घमंडी और प्रबल इच्छाओं वाला बना देता है जिनका पूरा होना ससार में असम्भव ही रहता है। ऐसे व्यक्ति सदैव अपनी आवश्यक वस्तुओं के लिये ही नहीं बल्कि नित्य-प्रति के कार्यों में भी अपने से धनवान आदमियों के खचों पर ही दृष्टि रखते हैं। उनकी दृष्टि निर्धन, गरीब आदमियों पर जाती ही नहीं कि वे किस मुसीबत से अपने दिन व्यतीत करते हैं। इसलिये जीवन में अधिकतर दुखी ही रहते हैं। नितिन कुमार पामिस्ट

(२) यदि तर्जनी उगली का दूसरा पोरुआ शेप दोनों पोरुओं से लम्बाई में अलग-अलग बड़ा हो तो वह व्यक्ति बड़ी ही विस्तृत तथाप्रबल इच्छाओं वाला होता है। ऐसा व्यक्ति कार्य पर विश्वास न कर या परिश्रम को न चाहकर मस्तिष्क पर अधिक विश्वास करता है और वह सदैव ऐसे कार्य या व्यक्ति की खोज में रहता है जो कार्य न करने पर भी समय-समय पर आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये प्रचुर मात्रा में धन दौलत प्रदान करता रहे।

(३) यदि तर्जनी उँगली का तृतीय पोरुआ शेष दोनों पोरुओं से अधिक लम्बा हो तो वह मनुष्य कायदे-कानून की परवाह से निश्चिन्त-सा ही रहता है और अनुशासन की कोई परवाह नहीं करता। उसमें स्वाभिमान प्रचुर मात्रा में होता है। यदि इस पोरुए की लम्बाई-चौड़ाई वर्गाकार हो तो ऐसा व्यक्ति सदव सचाई की खोज में प्राकृतिक सबूत चाहने वाला होता है। बाल की खाल निकालकर बात की तह में पहुँचने वाला होता है। यदि पोरुआ ढलवाँ तथा मोटा हो तो मनुष्य अनेक प्रकार के भोजन खाने का शौकीन होता है। उसे खाना खाते समय अनेक सब्जियाँ, दाज, चटनियाँ आदि चाहिये। यदि सर्प की भाँति ऊपर को पतला होता ज य तो घर्म विरुद्ध आचरण करने वाला निर्दयी तथा अन्यायी होता है। उसे किसी को व्यर्थ सताने में मजा मिलता है। यदि यह पोरुआ सभान रूप से लम्बा-चौड़ा तथा मोटा हो तो, गला, फेफड़ा, नाड़ी आदि में खराबी करता है। उसका स्वास्थ्य खराब रहता है। यदि यह अधिक मांस के कारण गुदगुदा हो तो पेट में वायु विकार करता है जिससे पेट फूलना, नजला, जुकाम आदि बीमारियाँ अधिक होती हैं।

मध्यमाः-

(१) यदि मध्यमा उ'गली का प्रथम पोरूआा लम्बा तथा चौकोर तरह का होता है तो मनुष्य बहुत ही समझदार तथा बातचीत में कुशल और व्यवहार में मृदुल होता है। वह सब के साथ सहानुभूति रखता है तथा सब के दुख दर्द में काम आने वाला होता है। अधिकतर ऐसे व्यक्ति कुशल राजनीतिज्ञ होते हैं। जो कि व्याख्यान करते समय सर्वसाधारण का हृदय अपनी ओर आकर्षित करके अपने लक्ष तक पहुँचने में सफल होते हैं। नितिन कुमार पामिस्ट

(२) यदि मध्यमा उगली का द्वितीय पोरुआ प्रथम पोरुए की अपेक्षा अधिक सुन्दर, सुडौल, लम्बा तथा विस्तृत हो तो ऐसा व्यक्ति बडा भारीअनुसन्धानकर्ता तथा बात की तह में पहुँचने वाला होता है। वह चाहे जो भी व्यवसाय करे किन्तु उसकी सफलता तथा भाग्योदय कृपि उद्योग, खेती या भूमिधर होकर ही हो सकता है। ऐसा व्यक्ति कृषि विज्ञान का जानने वाला तथा नई-नई खोजों द्वारा खेती को बड़े ही वैज्ञानिक ढंग से करके लाभ उठाने वाला होता हैं। ऐतिहासिक तथा पुरातत्वविधान के अनुमन्धानों में भी काफी से ज्यादह दिलचस्पी लेने वाला होता है।

(३) यदि मध्यमा उगली का तीसरा पोरुआ दूसरे और पहले पोरुए की अपेक्षा बड़ा हो तो यह मनुष्य बड़ा ही मितव्ययी तथा चालाक होता है । पैसे को बड़ा ही देख-देखकर खर्च करता है। उसका बातों से ही उसके पैसे की गरिमा या घमण्ड प्रत्यक्ष प्रकट हो जाता है। वह घनलिप्सा से सदैव बेचैन रहता है। फटे पुराने तथा उतरे कपड़े पहनकर भी अपने लिये धन की एक विपुल राशि जोड़ लेता है। ऐसा व्यक्ति बड़ा हो या छोटा कभी भी एक रंग का सूट न पहनकर विभिन्न प्रकार के ही वस्त्र धारण करता है विवाह, शादी आदि में मिले कपड़ों को छोड़कर शेष अधूरे ही वस्त्र पहनता है।

अनामिका:-अनामिका उगली का यदि प्रथम पोरुआ लम्बा, चाकार तथा मुडौल हो तो वह मनुष्य बड़ा ही भारी कलाकार, चित्रकार होता है। उसमें अनेक वैज्ञानिक आविष्कारों के अनुसन्धानों की खोज करने की शक्ति होती है। ऐसे व्यक्ति सदैव प्रत्येक कार्य को अपने ही ढंग से नया रूप देकर करते हैं जिनकी कला-कृतियाँ बड़ी ही उपयोगी होती हैं।

(२) अनामिका उगली का यदि द्वितीय पोरुआ पहले पोरूए की अपेक्षा बड़ा तथा सुडौल हो तो मनुष्य में प्रत्येक व्यापारी सफलता पाने का शुभ गुण विद्यमान रहता है। वह धन कमाना तथा उसका व्यय करना दोनों ही बातें भली प्रकार जानता है। लोग उसे आदर की दृष्टि से देखते हैं। ये लोग नई-नई व्यापारिक खोजें करते रहते हैं। बुद्धि के तीव्र होते हैं, पढ़ने-लिखने में चतुर होते हैं। इसलिये सर्विस या नौकरी से ही सफल जीवन व्यतीत करते हैं।

(३) अनामिका उगली का यदि तीसरा पोरुआ दूसरे या तीसरे पोरए से लम्बाई में बड़ा हो तो मनुष्य बनावटी बातों से केवल दिखावा करने वाला होता है। चाहे घर में कुछ भी न हो फिर भी सुन्दर वस्त्र धारण करके तथा दूसरे शौकीनी के सामान अपने पास रखकर बड़े ही टाट वाट मे राजा बाबुओं की तरह रहते हैं। नितिन कुमार पामिस्ट

कनिष्टिका :-(१) यदि कनिटिका उगली का प्रथम पोरुआ दूसरे पोरुए की अपेक्षा लम्बाई में बड़ा हो तो मनुष्य सफल व्याख्यानकर्ता होता है। उसकी वाक शक्ति उत्तम तथा बयान शैली बड़ी ही आकर्पित होती है। ऐसे व्यक्ति अधिकतर वकील, न्यायाधीश, सफल इतिहास लेखक, कवि गल्पादि नाटक तथा अच्छे उपन्यासकार होते हैं जिनकी पुस्तकें जन साधारण में बहुत ही प्रचलित होती हैं। ऐसे व्यक्ति घन और यश दोनों से सम्मानित होते हैं ।


(२) कनिष्टिका उगली का यदि दूसरा पोरुआ पहले पोरुए की अपेक्षा लम्बाई में बड़ा हो तो वे व्यक्ति चीरफाड़ करने में अच्छा सर्जन, दवाई देने में अच्छा फिजीशियन, बहस करने में अच्छा वकील या बैरिस्टर तथा अच्छा न्यायाधीश होता है। और बहुत से व्यक्ति नवीन अनुसन्धानों द्वारा अनेक प्रकार के वैज्ञानिक अविष्कार करने वाले होते हैं। जोकि मनुष्यों के लिये बड़े ही हितकारी होते हैं। सफलता उनके आधीन ही रहती है ।

(३) कनिष्टिका उगली का यदि तीसरा पोरुआ दूसरे तथा प्रथम पारुए की अपेक्षा लम्बाई में बड़ा हो तो वह मनुष्य प्रत्येक कार्य करने की शक्ति रखता है। किन्तु उसे विशेष लाभ व्यापर से ही होता है। उसमें क्रय-विक्रय की स्वाभाविक विचार शक्ति दूसरे मनुष्यों की अपेक्षा कहीं अधिक होती है। यदि रवि रेखा हाथ में शुभ फलदायक हो तो ऐसा मनुष्य चाहे जैसे घर में भी उत्पन्न क्यों न हुआ हो व्यापार करने पर अवश्य ही घनवान होकर एक दिन बड़ा आदमी होगा और समाज में जादर पायेगा ।

नितिन कुमार पामिस्ट

उँगलियों का झुकाव, रंग तथा अन्तर - हस्तरेखा



तर्जनी :- साधारणतया अनेक हाथों के देखने से यही प्रतीत होता है कि वर्गाकार हाथों को (जिनमें उगलियाँ भी वर्गाकार होती है) छोड़कर शेष सभी प्रकार के हाथों में उगलियों का प्राकृतिक झुकाव गुण-कर्म और स्वभाव के अनुसार किसी न किसी उगली की ओर को अवश्य होता है। यह झुकाव किसी भी हाथ को अपने प्रभाव से वंचित नहीं रखता । किसी-किसी हाथ में तो इनका प्रभाव बड़ा ही असाधारण रूप धारण कर लेता है जोकि भाग्योदय में देर-सवेर कर बड़ा ही भारी परिवर्तन कर देता है। जिससे मनुष्य घबराहट तथा उल्लास की सीमा पर आचरण करते हुए व्याकुल हो जाता है। यदि किसी हाथ में तर्जनी उगली मध्यमा उगली की ओर को झुक हो तो वह मनुष्य केवल मन्मूबे बाँधने वाला, निरूत्साह, पराधीन, निश्चेष्ट तथा उदास रहने वाला होता है । उसका मन कार्य करने को करता है किन्तु बिगड़ जाने के भय से वह मध्य में ही हतोत्साह हो जाता है और कार्य को वही छोड़ देता है। यह सभी जानते हैं कि तर्जनी बृहस्पति की उगली है इसलिये वृहस्पति कार्यारम्भ में अत्यन्त उत्साह देता है किन्तु उसका झुकाव शनि की उगली की ओर होने के कारण उसके प्रभाव से वंचित नहीं रहता। ज्योतिष शास्त्रानुसार शनि का प्रभाव दीर्घसूत्री, उदासी प्रदान करने वाला तथा मलिन, बृहस्पति या गुरू से कम माना गया है। इसलिये शनि प्रत्येक कार्य के करने में देरी करता है । ऐसा मनुष्य जीवन में कोई विशेष उन्नति न करके उत्थान-पतन के बीच ही में चक्कर लगाता है । इसलिये तर्जनी का किसी भी रूप में मध्यमा उगली की ओर झुकना उचित नहीं है । बल्कि अपने ही स्वरूप में सीधा खड़ा रहना एक अत्यन्त शुभ लक्षण है।


मध्यमा :-मध्यमा उगली जिसे शनि की उगली भी कहते हैं हाथ के मध्य अर्थात् बीचो-बीच में होने के कारण ९० प्रतिशत व्यक्तियों के हाथों में आमतौर पर सीधी खड़ी रहती है। शनि ग्रह के पूर्ण प्रभाव से प्रभावित मनुष्य अपने भाग्य पर ही विश्वास कर निश्चेष्ट रहने लगता है अर्थात् जो भाग्य में होना होगा होता रहेगा, सोचकर किसी भी कार्य के करने में विशेष प्रयत्नशील नहीं रहता जिस कारण वह दूसरे व्यक्तियों की नजरों में आलसी या दीर्घसूत्री प्रतीत होता है। किन्तु विचार दृष्टि से यदि देखा जाय तो वास्तव में बात भी यही है कि कोई भी मनुष्य भाग्य से अधिक और समय से पहले कुछ भी नहीं पा सकता। प्रत्येक भली-बुरी बात के होने का समय भाग्य द्वारा पूर्व ही निश्चित कर दिया गया है, जिसके द्वारा संसार सृष्टि चक्र चल रहा है। किन्तु आधुनिक व्यक्ति रूस की उपमा देकर कुछ बोलने का साहस करेंगे। किन्तु वह सर्वथा निमूल ही रहेगा क्योंकि सर्व शक्तिमान परमेश्वर का विधान ही कुछ ऐसा है कि जिसने जैसे कर्म किये हैं वह उन्हीं के अनुसार देश, काल, जाति आदि में जन्म लेकर अपने अच्छे-बुरे समय का उपभोग करता है। शनि प्रधान मनुष्य उदास रहकर असम्भव प्रकार के मन्सूबे बाँधा करता है और जिनके पूर्ण न होने पर साधु आदि बनकर एकान्त में रहकर अपने दिन व्यतीत करने की सोचता है। यह अवगुण उसमें जन्म से ही होता है जो कि ठेस लगते ही जाग्रत हो जाता है। किन्तु जिन हाथों में शनि की उगली बृहस्पति की उगली की ओर झुकी होती है उनमें इस अवगुण का लोप होकर अनेक शुभ गुणों की वृद्धि हो जाती है। गुरू महाराज की कृपा से उसके अपने गुणों का दूसरी उगली में प्रवेश हो जाता है और ऐसा व्यक्ति अपने ४० प्रतिशत कार्यों में सफल हो जाता है। उसकी बढ़ती हुई अभिलाषायें ओर अग्रसर होता है। गुरू एक शुभ ग्रह है, जिसका साथ भी शनि को शुभ प्रभाव प्रदान करता है और यही मध्यमा उगली, यदि अनामिका (जिसका स्वामी सूर्य है) की ओर को झुक जाय तो मनुष्य के हाथ में और भी अशुभ गुणों का प्रवेश हो जाता है क्योंकि ज्योतिषाचायों ने सूर्य को शनि का और शनि को सूर्य का शत्रु माना है, ये दोनों ही क्रूर तथा पाप ग्रह भी हैं इसलिये ये दोनों ही एक-दूसरे को बुरा प्रभाव दिखाये बिना नहीं रहते । ऐसे मनुष्यों में बदले की भावना प्रबल तथा शत्रु के प्रति कुविचार सदव विद्यमान रहते है। ऐसा व्यक्ति अस्थिर चित्त तथा आशा-निराशा के समुद्र में गोते लगाने वाला होता है। जिस कारण किसी भी कार्य के शुभ परिणाम पर नहीं पहुँचता। ऐसे व्यक्ति की अपने पिता से नहीं बनती। और वह अपने गुरू जनों के सदा ही अहित की सोचता रहता है। उसके भाग्योदय में सदा ही रूकावट रहती है जिस कारण वह सदैव ही क्रोध वृति में रहता है। मध्यमा उगली का सूर्य उगली की ओर झुकना कभी भी हितकर नहीं होता इससे तो इसका अपने प्राकृतिक रूप में सीधा खड़ा रहना कहीं अच्छा होता है। बृहस्पति या तर्जनी की ओर झुका रहना एक अत्यन्त शुभ लक्षण है।

अनामिका:-जिसे तीसरी उ'गली या रवि और सूर्य उ'गली भी कहते हैं यदि यह उगली सुदृढ़-सुडौल तथा उतार-चढ़ाव के साथ सीधी भी हो तो अपने सम्पूर्ण गुणों से सुशोभित होती है। यदि साथ ही सूर्य रेखा भी शुभ फलदायक हो तो मनुष्य किसी न किसी विषय में अवश्य ही पारांगत होता है। ऐसी स्पष्ट स्थिति में अनामिका का सुफल देना अनिवार्य है और ऐसा मनुष्य अवश्य ही अपने कार्यों में सफलता प्राप्त करता है। और वह उत्साह तथा परिश्रम से उत्तरोतर अपनी उन्नति के लिये कार्य करने वाला होता है। यदि अभाग्यवश यह उगली शनि की उगली की ओर झुक जाय तो ऊपर कहे गये सभी गुण, अवगुणों में परिवर्तित हो जाते हैं। और शनि दोषों से मनुष्य प्रभावित होने लगता है। उसमें निराशा के अतिरिक्त चोरी, सुस्ती, उदासीनता, आलस्य तथा दूसरों का अहित करने की इच्छा प्रबल हो जाती है। वह किसी न किसी अपयशपूर्ण कार्य के द्वारा कुख्यात अवश्य हो जाता है। किसी अशुभ चिन्ह के प्रभाव से अत्याधिक प्रभावित हो जाने पर आत्मग्लानि से आत्महत्या तथा उत्तेजित होने पर बात की ठेस लगने पर वह दूसरों की हत्या तक कर बैठता है। इसके विपरीत यदि अनामिका उगली कनिष्टिका अर्थात् बुद्ध की उगली की ओर झुकी हो तो मनुष्य में अनेक शुभ गुणों का समावेश हो जाता है। ऐसा आदमी एक बड़ा व्पापारी, लेखक, कवि, कलाकार चित्रकार तथा अच्छा दस्तकार हो जाता है। उसे धार्मिक विषयों में आचार्य पदवी और पढ़ाई का कार्य करने में अच्छी सफलता मिलती है। ऐसे व्यक्ति स्कूल मास्टर होते हैं और दीक्षा का कार्य सुसम्पन्न करते हैं। अनामिका उगली का कनिष्टिका उगली की ओर को झुका रहना एक शुभ लक्षण हैजो कि व्यक्ति को धनाढ्य या मालदार बनाता है । नितिन कुमार पामिस्ट

कनिष्टिकाः-इसको चतुर्थ या चौथी उगली भी कहते हैं। इसका स्वामी बुध देवता है इसलिये इसको बुध की उगली भी कहते हैं। यदि यह उगली सीधी, सुडौल, चढ़ा-उतार की लम्बी हो तो मनुष्य में अनेक शुभ गुणों का समावेश स्वतः ही हो जाता है। ऐसा व्यक्ति बड़ा ही विनोदी, हास्य-रसकाभोक्ता, चंचल, अस्थिर प्रकृति, अचल वक्ता आदि गुणों से युक्त होने पर भी अपनी वाल्यचापल्यता को नहीं त्यागता। यदि कनिष्टिका उगली का झुकाव रवि या अनामिका उगली की ओर को हो तो उस मनुष्य के गुणों में और भी चार-चाँद लग जाते हैं और वह प्रत्येक कार्य में सफलता प्राप्त करने वाला होता है। ऐसा व्यक्ति पढ़ाईलिन्ताई के साथ-साथ व्यापारिक सफलताएँ भी समय-समय पर पाता रहता है। इसके विरुद्ध यदि यह उगली हथेली के बाहर की ओर झुकने वाली हो तो मनुष्य में अशुभ गुणों का समावेश हो जाता है । उसमें फिजूलखर्वी आदि अवगुण आ जाते है। सामुद्रिक शास्त्र में इस उगली का बाहर की ओर को झुकना अशुभ फलदायक कहा है और अन्दर की ओर झुकना घन सम्पन्न होने का लक्षण कहा गया है।

समस्त शुभ फलदायक देवताओं की उगलियों की ओर पर-अपर सभी उगलियों का झुकना उत्साह, सफलता तथा स्वतन्त्र विचारों का सार्थक करना बतलाता है। यह कार्यशील होने का प्रत्यक्ष लक्षण है। बुद्धिगत बातों को पूर्ण करने के लिये तत्पर रहना और सफलता के लिये उद्योग करना सिखाता है। सभी उगलियों का हथेली की ओर को झुका होना कोई शुभ लक्षण नहीं है। क्योंकि ऐसे व्यक्ति घनतृषित तो होते हैं किन्तु कुशाग्रबुद्धि तथा प्रत्युत्पन्नमति नही होते अर्थात् वे समयानुसार कार्य करने में असमर्थ होते हैं। उत्साह रहित तथा भीरू प्रकृति के होते हैं जिस कारण मिलनसार न होकर सदैव, एकान्त, शान्त स्थान पर व्यर्थ विचारों में तल्लीन रहते हैं। फिर भी अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिये सदैव तत्पर रहते हैं। अपनी बुराई करने वालों की अखेिं ताड़ लेते हैं। इसके विपरीत वे लोग जिनकी उगलियाँ, उगलियों के पृष्ट भाग की ओर झुकी होती है, बड़े ही तेज वृद्धि, बात को पकड़ने वाले होते हैं। उन्हें बात के समझने में देर नहीं लगती। ऐसे व्यक्ति अन्य शुभ गुणों से युक्त होने पर अच्छे-अच्छे पदों पर पहुँचने वाले होते हैं ऐसे मनुष्यों का स्वभाव कोमल, वाणी मधुर और प्रकृति सरल होती है और अशुभ गुणों या दोषों का बाहुल्य होने पर घन पिपासा को शान्त करने के लिये इधर-उधर भटकने वाला होता है । और अपनी चालाकी से दूसरे व्यक्तियों को ठगकर या बेवकूफ बनाकर खाने वाला होता है। नितिन कुमार पामिस्ट

उगलियों के रंग :-साधारणत: देखने में यही आता है कि हाथों की तरह उगलियों के रंग भी तीन ही प्रकार के होते हैं प्रथम उगलियों के रंग देखने में कमल के समान गुलाबी होते है। ऐसे रंग की उगलियों वाले मनुष्य बड़े ही भाग्यशाली, धनवान, जमीन जायदाद वाले होते हैं और बड़े ही घार्मिक, देवाराधक तथा भक्त कोटि के कर्मकांडी होते हैं । ऐसे व्यक्ति बड़े ही सीधे-सादे तथा समाजसेवी होते हैं फिर भी उनके साथी उन्हें कम पसन्द करते हैं। उनका स्वभाव सरल तथा कोमल होता है वे किसी का भी हृदय दुखाकर कार्य करना नहीं चाहते। उनके हाथ बड़े ही कोमल तथा मुलायम होते हैं जिससे ये कोई कठिन कार्य नहीं कर पाते । उनके स्वभाव में यह विचित्रता पाई जाती है कि वे साँसारिक आपत्तियाँ सहन कर सकते हैं किन्तु प्रार्थना या सन्ध्यावन्दन के समय किसी प्रकार की भी अशान्ति या शोरोगुल सहन नहीं कर सकते । अश्लील शब्द श्रवण से ही उनका पारा गर्म हो जाता है। नितिन कुमार पामिस्ट

हाथों में दूसरे प्रकार की उगलियाँ चित्रवत सुन्दर तथा गौर वर्ण की होती है। ऐसे मनुष्य अपनी ही सुन्दरता के प्रेमी तथा स्वाभिमानी होते हैं। उन्हें अपने ही रूप का घमंड मिलनसारी से वंचित कर शुष्क प्रकृति बना देता है। ऐसे मनुष्य समाज सेवा से बहुत दूर, बड़े ही आरामतलब होते हैं। जब कभी किसी व्यक्ति के सम्पक में आते हैं तो हसहंसकर बातें करते हैं और दूसरों को बेवकूफ समझते हैं। ऐसे मनुष्यों को प्रसन्न होते तथा नाराज होते कुछ अधिक देर नहीं लगती इसलिये वे किसी के भी विश्वसनीय या विश्वासपात्र नहीं हो पाते । ऐसे मनुष्यों से सदैव ही बचकर रहना चाहिये अन्यथा किसी समय भी बेइज्जती होने का डर रहता है।

तीसरे प्रकार की उगलियाँ वे होती हैं जोकि रक्त की अधिकता के कारण सदैव ही सुर्ख दिखाई देती हैं। ऐसे व्यक्तियों के हृदय कोमल तथा हाथ कठोर होते हैं। ये लोग सख्त मेहनत से घबराते नहीं और अपने परिश्रम से उन्नति करने वाले सभी बगों में पाये जाते हैं। ये लोग अत्याधिक धनवान न होकर औसत दर्ज के आदमी रहते हैं और अपने कार्यों को सुचारू रूप से चलाते हैं। ये लोग व्यसनी भी होते हैं किन्तु जिन हाथों में अधिक मुखों के कारण उगलियों का रंग नीला-सा दृष्टित होता है वे लोग जालिम होते हैं। नितिन कुमार पामिस्ट

जिन लोगों के हाथ मुलायम, उगलियाँ कोमल रक्तहीन-सी स्वेत दिखाई देती हैं। वे मनुष्य सदैव कामवासना से पीड़ित रहते हैं। और अपने साथियों में अश्लील शब्दों का बहुत प्रयोग करते हैं। ऐसे लोग अपनी लज्जा को निर्लज्ज बनाने में अपनी खूबी समझते हैं। इनके मित्रों की संख्या बहुत होती है जिनके सहारे ये लोग गन्दी हंसी मजाक करके अपने समय का दुरुपयोग करते हैं। ऐसे व्यक्तियों की मुखाकृति से ही उनके हृदय की शैतानी झलकती है।


उगलियों के बीच का अन्तर :-यदि हाथ की उगलियों को सीधा मिलाकर देखने से आर-पार उगलियों के मध्य, छिद्रों में से दिखाई दे तो समझना चाहिये कि ऐसा व्यक्ति कभी-कभी आय से भी अधिक खर्च करने वाला होता है और यदि उगलियाँ एक दूसरे से चिपककर बन्द हो जाएँ जिसमें दूसरी ओर का कुछ भी दिखाई न दे तो वह मनुष्य कृपण तथा धनवान होता है। तर्जनी और अँगूठे के बीच सभी हाथों में अन्तर पाया जाता है। यह फासला जितना अधिक होगा मनुष्य उतना ही स्वछन्द विचारों वाला होगा और यह फासला जितना न्यून या थोड़ा होगा वह मनुष्य उतना ही अधिक संकुचित विचारों वाला होगा। उसके प्रत्येक कार्य में संकोच पाया जायगा और यह फासला शनै:-शनै समकोण होने तक जैसे-जैसे बढ़ता जायगा। वैसे ही वैसे वह मनुष्य दयालु, स्वतन्त्र विचारों तथा आचरण वाला होता जायगा । इसलिये तर्जनी और अँगूठे के बीच का अन्तर न तो अत्यधिक और न न्यूनतम ही उचित होता है। बस्कि समकोण बनाने वाला अन्तर शुभ होता है। अत्यधिक और न्यूनतम, ये दोनों ही प्रकार के अन्तर सामाजिक तथा साँसारिक व्यक्तियों के लिये कुछ फलदायक सिद्ध नहीं होते।

तर्जनी और मध्यमा के बीच तीसरे पोरुए का छिद्र दयावान तथा दानी होने का लक्षण है। दूसरे और पहले पोरुओं का अलग-अलग होना या छिद्र दिखाई देना विचारों की पूर्ण स्वतन्त्रता का प्रतीक है।

मध्यमा और अनामिका के तीसरे पोरुए में अन्तर होना भक्त देवाराधक तथा धार्मिक प्रवृत्ति होने का लक्षण है । ऐसा व्यक्ति अपनी प्रशंसा आप स्वयं करने वाला होता है। प्रथम और द्वितीय पोरुओं का पृथक होना या छिद्र दिखाई देना मनुष्य के दृढ़ विचारों को स्थिर बनाता है। ऐसा व्यक्ति तेजस्वी तथा घमंडी होता है। किन्तु फिर भी सफल मानव जीवन व्यतीत करने के लिये इन दोनों उगलियों के बीच अन्तर रहना अति आवश्यक है। इससे उस व्यक्ति को धन और यश दोनों ही की प्राप्ति होती है। नितिन कुमार पामिस्ट

कनिष्टिका और अनामिका के तीसरे पारुए का अलग रहना किसी के यौवन तथा प्रौढ़ावस्था में भी बचपन का भाव भरता है। ऐसा व्यक्ति Iाम्यास्पद गल्प, कहानी, कविता आदि लिखने में अपने स्वतन्त्र विचारों की प्रकट करता है। प्रथम और द्वितीय पोरुए के बीच अन्तर होने से किसी भी कार्य में सफलता कम मिलती है और मिले रहने से सफलता खूब मिलती है।

यदि कोमल हाथों की उगलियों में अन्तर हो तो मनुष्य के विचारों को स्वतन्त्र और आचरण को स्वच्छन्द बना देता है और ऐसे व्यक्ति सामाजिक बन्धनों से दूर अपना निराला पंथ चलाकर चला करते हैं। वे किमी का व्यर्थ दबाव नहीं सहते और निन्दादि की परवाह न करके अपने कार्य को पूर्ण करके ही छोड़ते है। विपरीत इसके जिन हाथों में उगलियाँ एक दूसरे से सटीं तथा मिली हुई होती हैं वे लोग धर्मभीरू, समाजभीरू होते हैं और रुढ़ियों पर चलकर निन्दा, अपयश से अपनी रक्षा करते हैं। वे लोग दुनिया की कानाफूसी या जगती जनरव से घबराते है। जिस कारण कई लाभप्रद कार्य भी छोड़ देते हैं। उन्हें जग की भलाई तधा परोपकार का विशेष ध्यान रहता है। रामय-समय पर वे लोग गरीब तथा दीनों की मदद करते देखे जाते है।

नितिन कुमार पामिस्ट


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Question: How much the detailed palm reading costs?

Answer: Cost of palm reading:


  • India: Rs. 600/- 
  • Outside Of India: 20 USD

( For instant palm reading in 24 hours you need to pay extra Rs. 500 or 15 USD ) 
(India: 600 + 500 = Rs. 1100/-)
(Outside Of India: 20 + 15 = 35 USD) 

Question: How you will confirm that I have made payment?

Answer: You need to provide me some proof of the payment made like:

  • UTR/Reference number of transaction. 
  • Screenshot of payment. 
  • Receipt/slip photo of payment.

Question: I am living outside of India so what are the options for me to pay you?

Answer: Payment options for International Clients:

International clients (those who are living outside of India) need to pay me 20 USD via PayPal or Western Union Money Transfer.

  • PayPal (PayPal ID : nitinkumar_palmist@yahoo.in)
    ( Please select "goods or services" instead of "personal" )
  • PayPal direct link for $20 (You will get reading in 9/10 days) - PayPal Payment 20 dollars
    PayPal direct link for $35 (You will get reading in 24 hours) - PayPal Payment 35 dollars
  • Western Union: Contact me for details.

Question: I am living in India so what are the options for me to pay you?


Answer: Payment options for Indian Clients:

  • Indian client needs to pay me 600/- Rupees in my SBI Bank via netbanking or direct cash deposit.

  • SBI Bank: (State Bank of India)
       Nitin Kumar Singhal
       A/c No.: 61246625123
       IFSC CODE: SBIN0031199
       Branch: Industrial Estate
       City: Jodhpur, Rajasthan. 



  • ICICI BANK: 
      (Contact For Details)

Email ID: nitinkumar_palmist@yahoo.in




Client's Feedback - DECEMBER 2017



If you don’t have your real date of birth then palmistry is there to help you for future life predictions.  Our palm lines, signs, mounts and shapes which are very useful in predicting the person’s life. We can predict your future from the lines and signs of your both palms. We can predict your future by studying your palm lines and signs. There is no need to send us your date of birth , time of birth , place of birth etc . Palm told the personality ,future ups and downs thus a experienced palmist can guide you to deal with upcoming challenges with vedic remedies.